ओडिशा पुलिस हाल के दिनों में अपराधियों के खिलाफ अपनी आक्रामक कार्रवाई और मुठभेड़ों को लेकर सुर्खियों में रही है। लेकिन इसी बीच तालचुआ, बारंग और कबिसूर्यनगर की घटनाओं ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन मामलों में हिरासत में कथित थर्ड डिग्री टॉर्चर, मारपीट और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप सामने आए हैं, जिससे कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिक अधिकारों की रक्षा के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस को अपराध नियंत्रण और कानून लागू करने का अधिकार प्राप्त है। लेकिन यह अधिकार संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर ही प्रयोग किया जाना चाहिए। यदि जांच या पूछताछ के नाम पर हिरासत में शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना दी जाती है, तो यह न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। तालचुआ, बारंग और कबिसूर्यनगर की घटनाओं में पीड़ित पक्षों ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। भले ही इन मामलों की जांच और सत्यापन अभी विभिन्न स्तरों पर जारी हो, लेकिन लगातार सामने आ रहे ऐसे आरोप चिंता पैदा करते हैं। यदि कहीं पुलिसकर्मियों द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग हुआ है, तो निष्पक्ष जांच और जवाबदेही सुनिश्चित होना आवश्यक है। वर्तमान राज्य सरकार अपराध और अपराधियों के खिलाफ सख्त नीति अपनाने की बात कर रही है। आम जनता भी अपराधियों पर कठोर कार्रवाई चाहती है। लेकिन अपराधियों के खिलाफ सख्ती और हिरासत में प्रताड़ना दो अलग-अलग बातें हैं। कानून का शासन तभी मजबूत माना जाएगा जब अपराधी भी कानून के अनुसार दंडित हों और निर्दोष व्यक्ति को न्याय मिले। ओडिशा पुलिस की छवि एक पेशेवर और सक्षम बल की रही है। ऐसे में कुछ घटनाओं के कारण पूरे विभाग की प्रतिष्ठा प्रभावित न हो, इसके लिए पारदर्शी जांच, दोषियों पर कार्रवाई और मानवाधिकार मानकों का पालन बेहद जरूरी है। कानून का डर होना चाहिए, लेकिन कानून पर जनता का विश्वास उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। Post navigation Electric Vehicles Mandatory for Government Use in Odisha: ସରକାରୀ କାର୍ଯ୍ୟରେ ବାଧ୍ୟତାମୂଳକ ଇଭି ଯାନ ବ୍ୟବହାର ପାଇଁ ନିର୍ଦ୍ଦେଶାବଳି ଜାରି Trainee IPS Officer removed from Kabisuryanagar PS Charge after Custodial Death Allegation; 3 Cops suspended