पश्चिम बंगाल में हाल ही में अभिषेक बनर्जी के काफिले पर हुए हमले ने एक बार फिर राजनीति की उस सच्चाई को सामने ला दिया है जिसे अक्सर सत्ता में बैठे लोग नजरअंदाज कर देते हैं। यह घटना किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराई जा सकती। लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। लेकिन ऐसे घटनाक्रम यह भी याद दिलाते हैं कि सत्ता और प्रभाव स्थायी नहीं होते।

यह सबक केवल अभिषेक बनर्जी के लिए नहीं, बल्कि हर उस नेता, मंत्री, सांसद, विधायक और राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए है जो किसी समय सत्ता के केंद्र में होता है। जब सत्ता का उपयोग विरोधियों को दबाने, अपमानित करने या प्रताड़ित करने के लिए किया जाता है, तब समाज और राजनीति में असंतोष की परतें जमा होती रहती हैं। समय बदलने पर वही असंतोष प्रतिक्रिया के रूप में सामने आ सकता है।

भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण पहले भी देखे गए हैं। कई राज्यों में सत्ता परिवर्तन के बाद पूर्व सत्ताधारी नेताओं को विरोध, घेराव, कानूनी कार्रवाई या जनाक्रोश का सामना करना पड़ा। कुछ मामलों में राजनीतिक हिंसा भी देखने को मिली। यह किसी एक दल या विचारधारा की समस्या नहीं, बल्कि सत्ता के दुरुपयोग से जुड़ी व्यापक चुनौती है।

लोकतंत्र में प्रतिद्वंद्वी को शत्रु नहीं माना जाता। जो नेता सत्ता में रहते हुए भी संयम, संवाद और सम्मान की राजनीति करते हैं, उनके लिए सत्ता परिवर्तन भी भय का कारण नहीं बनता। इसलिए हर राजनीतिक नेतृत्व को यह याद रखना चाहिए कि सत्ता क्षणिक है, लेकिन व्यवहार की स्मृति लंबे समय तक समाज में जीवित रहती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *