पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर केंद्र सरकार के खिलाफ मुखर हैं। चाहे मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (SIR) का मुद्दा हो, केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई हो या संघीय ढांचे का सवाल—ममता लगातार अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। लेकिन इस बार राजनीतिक तस्वीर पहले जैसी नहीं दिखती। विपक्षी एकजुटता कमजोर है और अधिकांश क्षेत्रीय दल अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों में उलझे हैं। ऐसे में ममता की लड़ाई काफी हद तक अकेली नजर आती है। राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी साझा रणनीति का अभाव है। अलग-अलग राज्यों में दलों के अलग-अलग हितों ने एक मजबूत राष्ट्रीय मोर्चे की संभावना को कमजोर कर दिया है। परिणामस्वरूप, जिन मुद्दों को ममता लोकतंत्र, संविधान और मतदाता अधिकारों से जोड़कर उठा रही हैं, उन्हें व्यापक विपक्षी समर्थन नहीं मिल पा रहा। फिर भी राजनीति केवल संख्या का खेल नहीं होती। कई बार अकेली आवाज भी राष्ट्रीय विमर्श को नई दिशा देती है। लेकिन यदि विपक्ष वास्तव में प्रभावी चुनौती देना चाहता है, तो उसे व्यक्तिगत संघर्षों से आगे बढ़कर साझा एजेंडा और समन्वित रणनीति अपनानी होगी। अन्यथा ममता बनर्जी की यह लड़ाई साहस का प्रतीक तो बनेगी, लेकिन राजनीतिक परिणाम सीमित रह सकते हैं। Post navigation Gajapati Maharaja explains reason behind ISKCON’s untimely Ratha Jatra