हाल के दिनों में देश की राजनीति में एक नया चलन देखने को मिल रहा है। कुछ विपक्षी नेता और सरकार के आलोचक युवाओं, विशेषकर जेनरेशन-ज़ेड (Gen Z), से सड़कों पर उतरकर “न्याय की लड़ाई” लड़ने का आह्वान कर रहे हैं। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और असहमति नागरिकों का अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक नेतृत्व युवाओं को संस्थागत लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बजाय सड़क पर टकराव की राजनीति की ओर धकेल रहा है?

भारत एक विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र है। यहां परिवर्तन का मार्ग चुनाव, न्यायपालिका, संसद, मीडिया और जनमत से होकर गुजरता है। यदि राजनीतिक विमर्श का केंद्र सड़क पर शक्ति प्रदर्शन और भीड़ की राजनीति बन जाए, तो इससे अराजकता का खतरा बढ़ सकता है। दुनिया के कई देशों में राजनीतिक अस्थिरता और उग्र आंदोलनों ने लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा किए हैं। भारत को ऐसे किसी रास्ते से बचना होगा।

साथ ही, राजनीति में दोहरे मानदंड भी नहीं होने चाहिए। यदि कोई नेता या दल लगातार सड़क-आधारित आंदोलन, घेराव और जनदबाव की राजनीति को बढ़ावा देता है, तो बाद में भीड़ की प्रतिक्रिया या उग्र माहौल पर केवल राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। हिंसा चाहे किसी के खिलाफ हो, उसकी निंदा समान रूप से होनी चाहिए।

भारत को आंदोलन और अराजकता के बीच का अंतर समझना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि राजनीतिक दल युवाओं को लोकतांत्रिक भागीदारी, नीति-निर्माण और रचनात्मक संवाद की ओर प्रेरित करेंगे, न कि टकराव और अस्थिरता की ओर। यही लोकतंत्र और राष्ट्रहित दोनों के लिए बेहतर मार्ग है।

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