दिल्ली में छात्रों के आंदोलन ने केवल शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली पर ही सवाल नहीं उठाए, बल्कि विपक्षी राजनीति की वास्तविक तस्वीर भी सामने ला दी। किसी भी जनआंदोलन में विपक्ष से यह अपेक्षा होती है कि वह साझा मुद्दों पर एकजुट होकर सरकार को जवाबदेह बनाए। लेकिन हालिया घटनाक्रम ने दिखाया कि विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक अविश्वास अब भी गहरा है।

शुरुआत में कांग्रेस इस आंदोलन से कुछ दूरी बनाए हुए थी, जबकि उसके छात्र संगठन एनएसयूआई लगातार सड़कों पर सक्रिय थे। दूसरी ओर, आंदोलन का नेतृत्व सिविल सोसायटी और अन्य समूहों के हाथ में रहा। राहुल गांधी के खुलकर आंदोलन से जुड़ने के बाद राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई दिए। इससे यह धारणा बनी कि कांग्रेस अब इस जनाक्रोश को व्यापक राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी जैसे दलों की असहजता भी चर्चा का विषय बनी, क्योंकि उन्हें आशंका हो सकती है कि आंदोलन का राजनीतिक लाभ कांग्रेस को मिल जाए।

हालाँकि लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी दल का जनआंदोलन से जुड़ना अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन यदि विपक्षी दल साझा उद्देश्य से अधिक राजनीतिक श्रेय की चिंता करने लगें, तो आंदोलन की धार कमजोर पड़ जाती है। जनता का ध्यान मूल मुद्दों से हटकर विपक्ष की आपसी खींचतान पर चला जाता है।

भाजपा के लिए ऐसी स्थिति राजनीतिक रूप से अनुकूल हो सकती है। जब विपक्ष एक स्वर में सरकार को घेरने में असफल रहता है, तब सत्तापक्ष के लिए आलोचनाओं का जवाब देना अपेक्षाकृत आसान हो जाता है। भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकजुटता होती है, जबकि उसकी सबसे बड़ी कमजोरी नेतृत्व और श्रेय की प्रतिस्पर्धा।

आख़िरकार, यदि विपक्ष साझा मुद्दों पर भी साझा रणनीति नहीं बना पाया, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उसी को होगा। जनता परिणाम चाहती है, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष केवल सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित नहीं करता, बल्कि जनता के विश्वास का भी आधार बनता है।

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