‘आरक्षण हटाओ अभियान’ को लेकर देश में एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर चल रहे अभियानों, बयानों और आरोप-प्रत्यारोपों ने इसे राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में कोई संगठित नीति या आंदोलन है, या फिर राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने वाला एक नैरेटिव? आरक्षण भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए इससे जुड़े किसी भी मुद्दे पर तथ्यों, संवैधानिक प्रावधानों और आधिकारिक निर्णयों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए, न कि केवल वायरल पोस्ट या राजनीतिक दावों के आधार पर। लोकतंत्र में किसी भी नीति की समीक्षा और आलोचना स्वाभाविक है, लेकिन ऐसे संवेदनशील विषयों पर भ्रम, भय या ध्रुवीकरण पैदा करने से बचना भी उतना ही आवश्यक है। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है कि वे स्पष्ट रुख अपनाएं और जनता को तथ्यपरक जानकारी दें। आरक्षण पर बहस हो सकती है, लेकिन वह जिम्मेदारी, संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक सद्भाव को ध्यान में रखकर ही होनी चाहिए। Post navigation PM Modi Welcomes Passage of Anti-Paper Leak Bill in Parliament