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अमेरिका और भारत के संबंधों को लेकर अक्सर भावनात्मक तस्वीर पेश की जाती है, लेकिन विश्व राजनीति भावनाओं से नहीं, हितों से संचालित होती है। डोनाल्ड ट्रंप का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करना भी इसी कूटनीतिक खेल का हिस्सा माना जा सकता है। बड़े राष्ट्र अपने हितों की पूर्ति के लिए मित्रता, प्रशंसा और साझेदारी की भाषा का इस्तेमाल करते हैं।

इतिहास गवाह है कि अमेरिका ने कई बार अपने सहयोगियों तक को परिस्थितियों के अनुसार बदला है। ऐसे में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि ट्रंप भारत के कितने बड़े मित्र हैं, बल्कि यह है कि भारत अपने हितों की रक्षा कितनी मजबूती से कर सकता है।

नई दिल्ली को किसी भी नेता की प्रशंसा या व्यक्तिगत समीकरणों से प्रभावित होने के बजाय आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान उन्हीं देशों को मिलता है, जो अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हैं।

By Nirvay

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