प्रदूषण सर्टिफिकेट जैसे मामलों में पहले ही ओड़िशा सरकार अपने हाथ जला चुकी है और अब स्मार्ट मीटर परियोजना में भी सरकार ने मानो अपने पैर कीचड़ में डाल दिए हैं। इस योजना को लेकर उठते सवाल अब ओड़िशा हाईकोर्ट तक पहुँच चुके हैं और आने वाले समय में यह मुद्दा सरकार के लिए और परेशानी खड़ी कर सकता है। ओड़िशा कैबिनेट के एक फैसले के तहत पहले चरण में 12 लाख उपभोक्ताओं के लिए स्मार्ट मीटर लगाने हेतु 765 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इसमें करीब 8.75 लाख पुराने मीटर बदले जाएंगे और 2.78 लाख नए कनेक्शनों में स्मार्ट मीटर लगाए जाएंगे। 2 किलोवाट या उससे कम बिजली खपत करने वाले उपभोक्ताओं को स्मार्ट मीटर मुफ्त देने की घोषणा की गई है। सरल शब्दों में कहें तो उपभोक्ता से मीटर लगाने के पैसे नहीं लिए जाएंगे। लेकिन यहीं से विवाद शुरू होता है। सवाल यह है कि जब मीटर मुफ्त हैं, तो भुगतान किसे और क्यों किया जा रहा है? असल में इसका बोझ करदाताओं के पैसे से उठाया जाएगा और फायदा पहुँचेगा टाटा पावर को। यहीं से करीब 488 करोड़ रुपये के संभावित घोटाले की आशंका जन्म लेती है। 2025 में बिजली विभाग ने ओडिशा विद्युत नियामक आयोग (OERC) से स्मार्ट मीटर लगाने की अनुमति मांगी थी। उस समय आयोग में अध्यक्ष नहीं थे और कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी गई थी—पहले ट्रांसफॉर्मरों पर स्मार्ट मीटर, फिर थ्री-फेज उपभोक्ताओं पर और अंत में 2 किलोवाट से कम उपभोक्ताओं पर। लेकिन इन शर्तों को दरकिनार कर सीधे कम खपत वाले उपभोक्ताओं पर फोकस क्यों किया गया, यह बड़ा सवाल है। सबसे गंभीर मुद्दा फिटिंग चार्ज का है। जहां अन्य राज्यों में स्मार्ट मीटर लगाने का चार्ज 140 से 200 रुपये है, वहीं ओडिशा में यह 700 रुपये प्रति मीटर तय किया गया है। इसका मतलब है कि प्रति मीटर 560 रुपये अतिरिक्त दिए जाएंगे। 80 लाख उपभोक्ताओं के हिसाब से यह रकम करीब 488 करोड़ रुपये बैठती है। यही वह बिंदु है जिसे अब लोग “488 करोड़ का स्मार्ट मीटर स्कैम” कह रहे हैं। सवाल साफ है—यह पैसा किसका है, किसके लिए है और किसके फायदे के लिए? जवाब सरकार को देना होगा। Post navigation Kotia Border Dispute: କୋଟିଆରେ ବେଆଇନ୍ ଅନୁପ୍ରବେଶ କଲେ କାର୍ଯ୍ୟାନୁଷ୍ଠାନ ନିଆଯିବ: ମନ୍ତ୍ରୀ Orissa High Court Contempt Case: ଅଦାଲତ ଅବମାନନା ମାମଲାରୁ ମୁକ୍ତି ପାଇଲେ IAS ଉଷା ପାଢ଼ୀ